श्रद्वा के साथ उपनिषद्, अष्टवक्र संहिताा, पंचदशी, विवेकचुड़ामणि आदि ग्रंथों का अध्ययन भी हो रहा था। साधना-पूजा पर काफी आगे बढ़ जाने के बाद नरेन्द्र के मन में निर्विकल्प समाधि की इच्छा प्रबल हो उठी। वह जानता था कि परमहंस इसके लिए मना कर रहे हैं, फिर भी वह एक दिन साहस करके उनके पास जा पहुचां।
रामकृष्ण ने नेह-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछा, ‘‘नरेन्द्र, तू क्या चाहता है?’’
उसने उत्तर दिया, ‘‘शुकदेव की तरह निर्विकल्प समाधि के द्वारा सदैव सच्चिानन्द-सागर में डूबे रहना चाहता हूं।’’
रामकृष्ण नरेन्द्र को चाहे सबसे अधिक चाहते थे, पर वह क्रुद्व स्वर में बोले, ‘‘बार-बार यही बात कहते तुझे लज्जा नहीं आती? समय आने पर कहां तू वटवक्ष की तरह बढ़कर सैकड़ों लोगों को शान्ति की छाया देगा, और कहां आज अपनी मुक्ति के लिए व्यस्त हो उठा। इतना क्षुद्र आदर्श तेरा?’’
वे एक दिन बरामदे में बेचैन घूर रहे थे और रोते हुए कह रहे थे , ‘‘मां, उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।’’ कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने को सम्भाला और कमरे में शिष्यों के पास आकर बैठ गए, ‘‘इतना रोया, पर नरेन्द्र नहीं आया’’ वे बेसुध से कह रहे थे, ‘‘उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा होती है, छाती के भीतर मानो कोई मरोड़ रहा है, पर मेरे खिंचाव को वह नहीं समझता।’’ जब नरेन्द्र आ जाता तो पहले उससे गाने सुनते और फिर खूब खिलाते-पिलाते थे। कई बार उसे ढूढ़ने खुद भी शहर जाते थे।