बुलाकर कहा, ‘‘देख, कठिन साधना द्वारा मुझे अष्ट सिद्वियां मिली थी। उनका किसी दिन कोई उपयोग मैं तो कर नहीं पाया। तू ले ले, भविष्य में तेरे बहुत काम आएंगी।’’

नरेन्द्र ने पूछा, ‘‘महाराज, क्या उनसे ईश्वर-प्राप्ति में कोई सहायता मिलेगी?’’

रामकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, सो तो नहीं होगा, पर इहलोक की कोई भी इच्छा अपूर्ण न रहेगी।’’

नरेन्द्र ने निस्संकोच उत्तर दिया, ‘तब तो महाराज, वे मुझे नहीं चाहिए।’’

1885 में रामकृष्ण के गले में कैंसर हो गया। डाॅ. महेन्द्रा लाल सरकार का इलाज था, पर रोग कम होने के बजाय बढ़ता चला गया। उन्हें पहले कलकत्ता के मकान में और फिर काशीपुर के उद्यान-भवन में रखा गया। नरेन्द्र ने अगस्त महीने में अध्यापन कार्य छोड़ दिया था और दूसरे शिष्यों के साथ काशीपुर में रहने

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लगा था। गुरू-सेवा के अलावा गम्भीर


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नरेन्द्र बहुत देर तक गाना गाते रहे। अंत में गाना समाप्त होने पर श्री रामकृष्ण देव बोले, ‘‘दक्षिणेश्वर चलेगा? कितने दिनों से नहीं गया है। चल न, फिर लौट आना।’’ नरेन्द्र उसी समय तैयार हो गए। पुस्तक आदि उसी तरह पड़ी रही। केवल तानपूरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरूदेव के साथ दक्षिणश्वर प्रस्थान किया।’’ ( विवेकानन्द साहित्य,अष्टम खंड, पृष्ठ 260-62)

नरेन्द्र अगर कुछ दिन तक दक्षिणेश्वर नहीं जाता था तो रामकृष्ण बहुत व्याकुल हो उठते थे। 1883 की बात है,


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