और फिर व्याख्या की, ‘‘आज ठाकुर से भावावेश में जैसा बताया, उससे जान गया हूं कि वन के वेदान्त को घर में लाया जा सकता है। सबसे पहले हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर ही जीव और जगत् के रूप में प्रकट होकर हमारे सामने विराजमान है। इसलिए शिवरूप जीवों की सेवा ही सबसे बड़ी भक्ति है।’’
फिर 3 जुलाई, 1897 को शरच्चन्द्र के नाम पत्र में उन्होंने इसी विचार को यों प्रस्तुत किया हैः
‘हमारा मूल तत्व प्रेम होना चाहिए, न कि दया। मुझे तो ‘जीवों के प्रति दया’ शब्द विवेकरहित और व्यर्थ जान पड़ता है। हमारा धर्म करूणा नहीं, सेवा करना है।’’ (वि. सा., षष्टम खंड, पृष्ठ 340)
इन दिनों नरेन्द्र परमहंस के बताए उपाय से साधना कर रहा था। कभी-कभी वह पंचवटी के नीचे रात-रात भर ध्यान में लीन रहता। उसका यह अनुराग देख रामकृष्ण ने एक दिन उसे अपने पास
हैं। वे बहुत डरे। दशरथि तो जल्दी-जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे। यह देखकर नरेन्द्र उनको रोककर कहने लगे, ‘उसकी कोई आवश्यकता नहीं। वे संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं, वे भावास्थ हुए हैं। फिर से गाना सुनते-सुनते वे चेतनायुक्त हो जाएंगे।’ नरेन्द्र ने इस बार श्यामा-विषयक गाना प्रारम्भ किया। उन्होंने एक बार ‘तेमनि तेमिन तेमनि करे नाचो मां श्यामा’ इस प्रकार के बहुत से श्यामा-विषयक कभी भावविष्ट हो जाते थे और कभी स्वाभाविक अवस्था प्राप्त कर लेते थे।