नरेन्द्र भी मौजुद था। इधर-उधर की चर्चा और हंसी-मज़ाक हो रहा था कि वैष्णव धर्म की बात उठी। रामकृष्ण ने इ धर्म का सारतत्व बताते हुए कहा, ‘‘इस मत में तीन विषयों का पालन आवश्यक बताया गया है-नाम में रूचि, जीवन के प्रति दया और वैष्णव पूजा।’’ इसके बाद यह बताते हुए कि शिव ही का यह जग्त संसार है, ऐसी धारणा हृदय में रखकर, ‘सब जीवों पर दया’ करनी चाहिए वे भावाविष्ट हो गए और कहने लगे, ‘‘जीव पर दया-जीव पर दया? धत् तेरी, कीटाणु-कीट होकर तू जीव पर दया करेगा। दया करने वाला तू कौन है? नहीं, नहीं, जीवन पर दया नहीं, शिव ज्ञान से जीव की सेवा।’’
भावाविष्ट रामकृष्ण के ये शब्द सभी ने सुने, पर उनके गूढ़ अर्थ को केवल नरेन्द्र ही ने समझा। उसने कमरे से बाहर आकर शिवानन्द से कहा, ‘‘आज मैंने एक महान सत्य को सुना है। मैं इस जीवित सत्य की सारे संसार में घोषणा करूंगा।’’
रामकृष्ण भी भावास्थ होने लगे। गाने के स्तर-स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा, आंखे भी अपलक हो गई, अंग स्पंदनहीन हो गए, मुख ने अलौकिक भाव धारण किया, और धीरे-धीरे संगमरमर की मूर्ति के समान निस्पंद हो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए। नरेन्द्र के मित्रों ने इससे पहले किसी मनुष्य को इस प्रकार भावास्थ नहीं देखा था। वे श्री रामकृष्ण की यह अवस्था देखकर मन में सोचने लगे-मालूम होता है, शरीर में किसी प्रकार की वेदना सहसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञाशून्य हो गए