सिद्वान्त को समझने का ठोस माध्यम है और हम अपनी इस कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

कुछ दिनों बाद मेट्रोपोलिटन स्कूल की एक शाखा चांपातला मुहल्ले में खुली। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की सिफारिश से नरेन्द्र वहां प्रधानाध्यापक नियुक्त हो गया। इससे पारिवारिक समस्या हल हो गई।

इस संकटकाल में कुछ संबंधियों ने नरेन्द्र और उसके घरवालों को खूब सताया। उन लोगों ने छलबल से उनके पैतृक मकान पर कब्ज़ा कर लिया। मां-भाइयों और नरेन्द्र को नानी के मकान में शरण लेनी पड़ीं नरेन्द्र ने संबंधियों के विरूद्व हाईकोर्ट तक मुकद्मा लड़ा। जिसमें कई बरस लगे और तब वह मकान उन्हें मिला।

रामकृष्ण के जितने शिष्य थे, वे सब 1884 तक उनके पास आ चुके थे। वे उन्हें काम-कंचन, भोग-विलास आदि से हटाकर धीरे-धीरे भक्ति मार्ग पर ला

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रहे थे। एक दिन परमहंस भक्तों से घिरे बैठे थे।


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भेज देते थे। नरेन्द्र अकेले खाने वाले तो थे नहीं, उनमें से कुछ संदेश लेकर पहले अपने मित्रों

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को दिए, फिर स्वयं खाया। श्री रामकृष्ण इसके बाद बोले, ‘अरे तेरा गाना तो बहुत दिनों से नहीं सुना, जरा गाना तो गा।’ उसी समय तानपूरा लेकर, उसका कान ऐंठ, स्वर बांधकर नरेन्द्र ने गाना प्रारम्भ कियाः-

जागो मां कुल कुंडलिनी

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‘‘ज्योंही गाना आरम्भ हुआ, श्री


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