‘‘ये महान शिक्षक इस पृथ्वी पर जीवंत ईश्वर रूप हैं इनके अतिरिक्त हम और किनकी उपासना करें? मैं अपने मन में ईश्वर की धारणा करने का प्रयत्न करता हूं और अन्त में पाता हूं कि मेरी धारणा अत्यन्त क्षुद्र और मिथ्या है। वैसे ईश्वर की उपासना करना पाप होगा। फिर जब मैं अपनी आंखें खोलकर पृथ्वी की इन महान आत्माओं के चरित्र देखता हूं तो मुझे प्रतीत होता है कि ईश्वर विषयक मेरी उच्च से उच्चतर धारणा से भी वे कहीं उच्चतर और महान हैं।’’ (वि. सा., पृष्ठ, 181.182)
वेदान्त सिद्वांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य, चूंकि वह आत्मस्वरूप है, अपने को ‘शिवोऽहम’-मैं ईश्वर हूं कह सकता है। इस सिद्वांत का तात्िवक विवेचन हम ‘आध्यात्मिक अद्वैतवाद बनाम भौतिक अद्वैतवाद, परिच्छेद में करेंगे। प्रत्येक सिद्वान्त चूंकि व्यक्तियों में मूर्तरूप धारण करता है, इसलिए नरेन्द्र अर्थात् विवेकानन्द की जीवन-कथा भी इस
इतने अस्त-व्यस्त होकर उन्हें परस्पर साक्षात्कार हुआ। श्री रामकृष्ण नरेन्द्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनों से गद्गद स्वर में कहने लगे, ‘तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं, तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं?’ बार-बार इस तरह कहते-कहते कमरे में आकर बैठ गए, बाद में अंगोछे में बंधे संदेश को खोलकर नरेन्द्र को ‘खा’ , ‘खा’ कहकर खिलाने लगे। वे जब कभी नरेन्द्र को देखने आते, तो कुछ-न-कुछ अति उत्तम खाद्य वस्तु उनके लिए अवश्य बांधकर ले आते थे, बीच-बीच में लोगों के द्वारा भी