49 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

नरेन्द्र की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले ईश्वर-दर्शन के बारे में भी विवेकानन्द का अभिमत जान लेना चाहिए ताकि भ्रम-भ्रान्ति की गुंजाइश न रहे। लिखा हैः

‘‘यदि तुम मुझसे पूछो कि इेश्वर है या नहीं और मैं यह कह दूं कि हां, ईश्वर है तो तुम झट मुझे अपनी युक्तियां बताने के लिए बाध्य करोगे और मुझ बेचारे को कुछ युक्तियां पेश करने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देनी पड़ेगी। किन्तु यदि कोई ईसा से यही प्रश्न पूछता तो ईसा तत्काल उत्तर देते, ‘हां, ईश्वर है।’ और यदि तुम ईसा से इसका प्रमाण मांगते तो निश्चय ही ईसा ने कहा होता, ‘लो, यह ईश्वर तुम्हारे सम्मुख खड़ा है, दर्शन कर लो।’ इस प्रकार हम देखते हैं कि इन महापुरूषों की ईश्वर-विषयक धारणा साक्षात् उपलब्धि, प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है, तर्क जन्य नहीं।’’ (वही, सप्तम खंड, पृष्ठ 180)

और फिर लिखा हैः


121 of 675



‘‘नरेन्द्र बहुत दिनों से श्री रामकृष्ण देव के पास नहीं गए थे। इसीलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कलकत्ता में नरेन्द्र के तंग में आए। उस दिन सवेरे नरेन्द्र के कमरे में दो सहपाठी, हरिदास चट्टोपाध्याय और दशरथि सान्याल बैठे थे। ये लोग कभी पढ़ते थे, तो कभी वार्तालाप करते थे। इसी समय बहिद्र्वार पर ‘नरेन’, ‘नरेन’ शब्द सुनाई पड़ा। स्वर सुनते ही नरेन्द्र हड़बड़ाकर तेजी से नीचे पहुंचे। उनके मित्रों ने भी समझ लिया कि श्री रामकृष्ण देव आये हैं, इसलिए नरेन्द्र


121 of 1117