भगवान का अवतार कहीं भी और किसी भी समय नहीं होता। एक ढाका ही में सुना है तीन-चार अवतार पैदा हो गए है। (वि.सा, षष्टम खंड पृष्ठ 176)
दरअसल विवेकानन्द अवतार को आचार्य के अर्थ में लेते हैं। यह सच है कि एक आचार्य के बाद दूसरा आचार्य आगे है-उनके द्वारा ज्ञान चाहे आध्यात्मिक हो या भौतिक उसकी निरन्तर प्रगति हुई है। अपने गुरू रामकृष्ण के बारे में भी लिखते हैं। ‘‘श्री रामकृष्ण अपने को अवतार शब्द के स्ािूल अर्थ में एक अवतार कहा करते थे, यद्यपि मैं यह बात समझ नहीं पाता था। मैं कहता था कि वे वेदान्त की दृष्टि से ब्रह्म हैं, किन्तु उनकी महा समाधि से ठीक पूर्व, जब उन्हें सांस लेने में कष्ट हो रहा था, मैं अपनेमन में सोच रहा था कि क्या इस वेदना में भी वे अपने को अवतार कह सकते हैं। उस समय उन्होंने मुझसे कहा, अरे, जो राम था, जो कृष्ण था, वही रामकृष्ण हो गया, लेकिन तेरे वेदान्त की दृष्टि से नहीं।...(वही, सप्तम खंड, पृष्ठ 269)
के ईश्वर, अल्लाह तथा गाॅड- अलग-अलग नाम रख लिये हैं और अपने-अपने मार्ग से एक उसी की खोज कर रहे हैं।
अब अपने इस आदर्श को कार्य-रूप देने के लिए उन्हें संगठन की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने 1884 में शिष्य बनानाा शुरू किए और 1886 में अपनी मृत्य के समय तक 25 शिष्य जुटा लिए थे। नरेन्द्र उन सबमें श्रेष्ठ था और परमहंस ने उसके निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। नरेन्द्र से उनका प्यार जुनून की हद तक बढ़ गया था। प्रियनाथ सिन्हा अपने संस्मरण में लिखते हैंः