द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के नियम के अनुसार साहित्य, दर्शन तथा
राजनीतिक-किसी भी क्षेत्र में सही समझ गलत समझ के साथ संघर्ष में विकसित होती है। प्रगतिशील साहित्यक आंदोलन और कम्युनिष्ट पार्टी में मैंने प्रवृत्िायों के विरूद्व जो संघर्ष किया उसी के परिणाम-स्वरूप मेरी यह समझ बनी है। संझर्ष औरों ने भी किया और इसी के परिणामस्वरूप संसदीय मार्ग छोड़ देने वाले क्रांतिकारी तत्वों ने तीसरी कम्युनिष्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) बनाई। और मैंने स्वभावतः उनका साथ दिया। लेकिन जब कलकत्ता में विवेकानन्द और विद्यासागर इत्यादि की मूर्तियां तोड़ी गई तो मैंने महसूस किया कि क्रांतिकारी तत्वों में भी विरासत में मिली गलत प्रवृत्िायां मौजुद हैं तो ऐतिहासिक परम्परा से जुड़ने के बाद संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया ही में दूर होंगी।
विवेकानन्द बीसवीं सदी के अंत तक हमारे चिंतन को विकसित करके जहां पहुंचा गए है। उससे सूत्र जोड़कर ही द्वन्द्वात्मक
थे। रूपक की भाषा में यों कह लीजिए कि विवेकानन्द पुनर्जागरण के सुविकसित कमल थे-सुन्दर भी और सुगंधित भी।
अतएव उक्त परिस्थितियों में हमारे उभरते हुए बुर्जवा ने अपनी राजनीतिक लड़ाई धर्म के माध्यम से लड़ी। विवेकानन्द ने अपने मद्रास के भाषण में कहा था कि पुनर्जागरण की तरंग ने मुझे ज़बरदस्ती बाहर फेंक दिया था। ‘‘सच्ची बात यह है कि मैं धर्म-महासभा का उद्देश्य लेकर अमेरिका नहीं गया, वह सभा तो मेरे लिए गौण वस्तु थी, उससे हमारा रास्ता बहुत कुछ साफ हो गया और कार्य करने की बहुत कुछ सुविधा हो गई।’’