मौलिक और अधिक प्रगतिशील थे। यह है किय योग, भक्ति, ज्ञान और कर्म के सर्वाेच्च भावों का सम्मिलित होना चाहिए, जिससे एक समाज का निर्माण हो सके।... प्राचीन आचार्य निस्संदेह अच्छे थे, परन्तु यह इस युग का नया धर्म है-अर्थात् योग, ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय आय और लिंगभेद के बिना, पतित से पतित तक में ज्ञान और भक्ति का प्रचार। पहले के अवतार ठीक थे, परंन्तु श्री रामकृष्ण देव के व्यक्तित्व में उनका समन्वय हो गया है।’’ (वही, पृष्ठ 401)
यहां प्रश्न उठ सकता है कि जब ईश्वर ही अवतार धारण करता है तो एक अवतार को दूसरे से-ईश्वर का ईश्वर से आगे अथवा प्रगतिशील होने का क्या अर्थ? विवेकानन्द ने इस प्रश्न का उत्तर भी दिया है। उन्होंने एक बार अपने एक शिष्य से कहा थाः
‘‘गुरू को लोग अवतार कह सकते हैं अथवा जो चाहे मानकर धारण करने की चेष्टा कर सकते हैं। परंतु
द्वन्द्व
‘‘सत्य तो केवल उन्हीं को प्राप्त होता है, जो निर्भय होकर, बिना दुकानदारी किए उसके मंदिर में जाकर केवल उसी के हेतु उसकी पूजा करते हैं।’’
-विवेकानन्द
रामकृष्ण परमहंस एक सच्चे मनीषी थे। वह अपने मनन और भिन्न-भिन्न समाधियों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ‘एक ही सत्ता एक साथ एक भी है और अनेक भी है’ और फिर घोषणा की थी कि हिंदू, मुसलमान, ईसाई तथा वैष्णव आदि सम्प्रदायों का धर्म के नाम पर आपस में लड़ना व्यर्थ है। उन्होंने एक ही सत्ता