48 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

और न ही निरूत्साहित। साधारण लोग तो सर्वदा ‘व्यक्ति’ ही चाहेंगे, उच्च श्रेणी के लोग ‘सिद्वान्तों को ग्रहण करेगें। हमें दोनों ही चाहिए, किन्तु सिद्वांत ही सार्वभौम है, व्यक्ति नहीं। इसलिए उनक द्वारा प्रचारित सिद्वातों ही को दृढ़ता से पकड़े रहो, लोगों को उनके व्यक्तित्व के बारे में अपनी-अपनी धारणा के अनुसार सोचने दो....’’ (वि.सा., चतुर्थ खंड, पृष्ठ 394)

गुरू-भाइयों के नाम 27 अप्रैल, 1896 को इंग्लैंड से लिखे एक लम्बे पत्र में रामकृष्ण के व्यक्तित्व और सिद्वांतों पर उन्होंने इस प्रकार प्रकाश डाला हैः

‘‘मतों आदि के बारे में मुझे यही कहना है कि यदि कोई रामकृष्णदेव को अवतार आदि स्वीकार करे तो भी ठीक ही है। परंन्तु सच बात तो यह है कि चरित्र के विषय में श्री रामकृष्ण देव सबसे आगे बढ़े हुए हैं। उनके पहले जो अवतारी पुरूष हुए हैं, उनसे वे अधिक उदार, अधिक


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अब देखना यह है कि इस अद्भुत पुरूष का स्वभाव और शक्ति क्या थी। नरेन्द्र ने उसे कैसे पहचाना और इस अद्भुत पुरूष ने नरेन्द्र को विवेकानन्द बनाने में क्या भूमिका अदा की? यह न सिर्फ हमारा, बल्कि भारतीय दर्शन के इतिहास का आवश्यक रोचक विषय है। गुरू और शिष्य-रामकृष्ण और विवेकानन्द, व्यक्ति नहीं युग-पुरूष हैं, हमारे राष्ट्रीय विचार के विकास-क्रम की ऐसी ऐतिहासिक कड़िया हैं, जिन्हें समझे बिना उस पहेली को सुलझाना मुमकिन नहीं, जिसे तथाकथित आध्यात्मवादियों ने बुरी तरह उलझा दिया है, और तथाकथित बामपंथियों ने जिसकी निरन्तर अवहेलना तथा उपेक्षा की है।


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