उन्हीं चीजों की शिक्षा देता हूं, जो विश्वमानवता के लिए हितकर हैं। यदि कोई ऐसी विचित्र विधि है, जो केवल मुझी पर लागू होती है, तो मैं उसे गुप्त रखता हूं, और यहीं पर बात खत्म हो जाती है। मैं तुम्हें नहीं बताऊंगा कि काली-पूजा क्या है, क्योंकि कभी मैंने इसकी शिक्षा किसी को नहीं दी।’’ (वि. सा, अष्टम खंड, पृष्ठ 339-40)
शिक्षा में वे सिद्वांत ही को प्रमुख मानते थे, यह बात स्वामी त्रिगुणातीतानन्छ को न्यूयार्क के लिखे 14 अपै्रल, 1896 के पत्र से भी स्पष्ट हो जाती हैः
‘‘रामकृष्ण परमहंस ईश्वर हैं, भगवान हैं-क्या इस प्रकार की बातें यहां चल सकती हैं?’’
‘‘सबके हृदय में बलपूर्वक उस प्रकार की भावना को बद्वमूल कर देने का झुकाव ‘मैं’ में विद्यमान है। किन्तु इससे हम एक क्षुद्र सम्प्रदाय के रूप में परिणत हो जांएगें। तुम लोग इस प्रकार के प्रयत्न से हमेशा दूर रहना। यदि लोग भगवद् बुद्वि से उनकी पूजा करें, तो कोई हानि नहीं है। उनको न तो प्रोत्साहित करना
बिना मैं कभी निश्चित नहीं हो सका। इसी स्वभाव में आज एक प्रचंड आघात प्राप्त हुआ है। इससे संकल्प का उदय हुआ-जैसे भी हो सके, इस अद्भुत पुरूष के स्वभाव और शक्ति की बात अवश्य ही समझनी होगी।’’
छरअसल यह अद्भुत पुरूष ही वह जीता-जागता आदर्श था, नरेन्द्र जिसे खोजता हुआ दक्षिणेशर पहुंचा था। लेकिन इस दृढ़ संस्कारयुक्त युवक ने इस अद्भुत
32 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पुरूष को तब तक गुरू के रूप में धारण नहीं किया जब तक उनके स्वभाव और शक्ति को भली प्रकार समझ नहीं लिया।