ठाकुर ही प्रथम दिन की भंेट से हर समय समान भाव से मेरे ऊपर विश्वास करते आए हैं, अन्य कोई नहीं-अपने मां-भाई भी नहीं। उनके इस प्रकार के विश्वास और प्यार ही ने मुझे जन्म भर के लिए बांध लिया है। केवल वही प्यार करना जानते हैं और कर सकते है।-संसार के दूसरे लोग केवल अपने स्वार्थ साधन के लिए प्यार करते हैं।’ ’’(वही पृष्ठ 182 से 185)
मूर्ति पूजा से घृणा करने वाला नरेन्द्र अंत में खुद मूर्तिपूजक बन गया। पे्रम से तर्क पराजित हुआ। बाद को जब वे नरेन्द्र विवेकानन्द बन गए थे, तब उन्होंने कुमारी मेरी हेल को लांस एंजिलिस से 18 जून, 1900 के पत्र में लिखा थाः ‘‘काली-पूजा किसी भी धर्म का आवश्यक साधन है। धर्म के विषय में जितना कुछ भी जानने योग्य है, तुमने कभी भी उसके विषय में मुझे प्रवचन करते या भारत में उसकी शिक्षा देते हुए नहीं सुना होगा। मैं केवल
सोचने लगा कि इच्छा मात्र से यह पुरूष यदि मेरे जैसे प्रबल इच्छशक्ति-सम्पन्न चित्त को दृढ़ संस्कारयुक्त गठन को इस तरह तोड़-फोड़ कर मिट्टी के लौंदे की तरह अपने भाव में ढाल सकते हैं तो इन्हें पागल ही कैसे समझूं? किन्त प्रथम दर्शन के दिन मुझे एकान्त में ले जाकर इन्होंने जिस प्रकार सम्बोधित करते हुए बातें की थी, उससे इन्हें पागल के अतिरिक्त और क्या मान सकता हूं। बुद्वि का उन्मेष होने के अनन्तर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के संबंध में एक मतामत स्थिर किए