47 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हुआ-क्यों?’ उसी बात को बारम्बार घुमा-फिराकर कहते हुए वे आनन्द प्रकट करने लगे।
‘‘निद्रा भंग होने पर लगभग दिन के चार बजे नरेन्द्र कमरे में आकर ठाकुर के पास बैठ गए। ठाकुर उन्हें देखते ही भावाष्टि होकर उनसे सटकर प्रायः उन्हीं की गोद में बैठे और कहने लगे, ‘अपना शरीर और नरेन्द्र का शरीर क्रमशः दिखाकर-देखता हूं कि यह मैं हूं, फिर भी मैं हूं, सच कहता हूं-कुछ भी भेद नहीं देख पा रहा हूं। जैसे गंगा के जल में एक लाठी का आधा भाग डुबा देने से दो भाग दिखाई पड़ते हैं-पर यथार्थ में दो भाग नहीं हैं, एक ही है। समझा, मां के सिवाय और है ही क्या-क्यों?’
‘‘बातचीत में आठ बज गए। उस समय ठाकुर की भावास्था कम होते देखकर नरेन्द्र और मैं उनसे विदा लेकर कलकत्ता लौट आए। इसके बाद हमने नरेन्द्र को अनेक बार कहते सुना है-‘अकेले
बातचीत की, प्यार और हास-परिहास किया और शाम को जब नरेन्द्र ने विदा चाही तो उन्होंने अप्रसन्न होकर कहा, ‘‘बोल, फिर शीघ्र ही आएगा तू!’’ लिखा है, ‘‘लाचार होकर पहले दिन की तरह वचन देकर ही लौटना पड़ा।’’
नरेन्द्र ने विस्मय की सीमा न थी। वह लौटते समय मन ही मन सोचने लगा कि आखिर यह पहेली क्या है? इस पहेली को तो समझना ही होगा। नरेन्द्र की इस समय की मनःस्थिति को स्वामी सारदानन्द ने अपने गं्रथ ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में यों व्यक्त किया हैः
‘‘मैं