आगे की बात परमहंस के एक भक्त तारापद घोष के मुख से सुनिए, ‘‘आज दोपहर को दक्षिणेश्वर जाकर मैंने देखा-श्रीरामकृष्णदेव अकेले कमरे में बैठे हैं और नरेन्द्र बाहर एक ओर पड़ा सो रहा है। पास जाकर प्रणाम करते ही उन्होंने नरेन्द्र को दिखाकर कहा, ‘‘देख, यह लड़का बड़ा अच्छा है, इसका नाम नरेन्द्र है। पहले मां को नहीं मानता था, कल मान गया है। कष्ट में है, इस कारण मां से पैसा-रूपया मांगने के लिए कह दिया था, परंतु मांग नहीं सका, कहा लज्जा आती है। मंदिर से लौटकर मुझसे कहा, मां का गाना सिखा दीजिए। ‘मांर्तवं ही तारा’ यह गाना सिखा दिया। कल रात भर वही गाना गाया, अब पड़ा सो रहा है। (प्रसन्नता से हंसते हुए) नरेन्द्र ने काली को मान लिया, बहुत अच्छा हुआ न?’ उन्हें इस बात से बालक के समान आनन्दित होते देख मैंने कहा, ‘हां, महाराज! ब्हुत अच्छा हुआ।’ कुछ देर बाद पुनः हंसते हुए बोले, ‘नरेन्द्र ने मां को मान लिया, बहुत अच्छा


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जब मैंने नरेन्द्र को देखा तब देखते ही पहचान लिया कि ऋषि का रूप वही है। ’’(पृष्ठ 35)

नरेन्द्र घबराया और भय से चिल्ला उठा, ‘‘अजी, आपने यह मेरी कैसी अवस्था कर डाली, मेरे तो मां-बाप हैं।’’

अब वह अद्भुत पागल खिलखिलाकर हंस पड़ा और नरेन्द्र का हाथ अपनी छाती पर रखकर बोला, ‘‘अच्छा, तो फिर अभी रहने दे।’’

इसके बाद रामकृष्ण परमहंस फिर सामान्य स्थिति में आ गए। उन्होंने नरेन्द्र को पहले ही दिन की तरह प्रेमपूर्वक खिलाया-पिलाया, विभिन्न विषयों पर


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