को नहीं मानता, इसलिए मां नहीं सुनती। अच्छा, आज मंगलवार है, मैं कहता हूं, आज रात को काली-मंदिर में जाकर मां को प्रणाम करके तू जो कुछ मांगेगा, वहीं मा तुझे देगी। मेरी मां चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है, उन्होंने अपनी इच्छा से संसार का प्रसव किया है। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकती?’’
परमहंस के आग्रह से नरेन्द्र एक बार नहीं, दो बार, तीन बार मंदिर में गया, पर वह एक बार भी स्वार्थपूर्ति के प्रार्थना नहीं कर पाया। लिखा है, ‘‘मंदिर में प्रवेश करते ही लज्जा ने हृदय को व्याप्त कर लिया, मैंने सोचा, यह कैसी तुच्छ बात है- मैं जगद्जननी को कहने आया। ठाकुर कहते हैं, ‘राजा की प्रसन्नता प्राप्त करके उनसे कह दूं- कोहंड़ा मांगना।‘ -यह भी वैसी मूर्खता की बात है। मेरी भी वैसी हीन बुद्वि हुई है। लज्जा से प्रणाम करते हुए मैंने फिर कहा, ‘मैं और कुछ नहीं मांगता मां, केवल ज्ञान और भक्ति दो...।
लगा। समाधि से जागकर ऋषि ने अपने अद्र्वोन्मीलित नेत्र शिशु पर स्थित कर दिए। उनकी वात्सल्यभरी मुद्रा से स्पष्ट था कि शिशु उन्हें कितना प्रिय है। आनन्द-विभोर होकर शिशु ने कहा, ‘‘मैं नीचे जा रहा हूं। आप भी मेरे साथ चलें’’ ऋषि ने उत्तर नहीं दिया, पर उनकी वत्सल दृष्टि में स्वीकार का भाव था। शिशु की ओर देखते-देखते
31 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वह फिर समाधिस्थ हो गए। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका एक अंश एक प्रकाश-पंुज के रूप में धरती की ओर उतर रहा है।