‘हम दोनों में वैसा ही कुछ हो गया।’ बाद में सब लोगों के चले जाने पर मुझे पास बुलाकर उन्होंने कहा, ‘जानता हूं, तू मां के काम के लिए संसार में आया है। संसार में तू कभी नहीं रहेगा, परंन्तु जब तक मैं हूं तब तक मेरे लिए रह।’ इतना कहकर वे हृदय के आवेग से पुनः आंसु रोक न सके।’’ (वहीं, पृष्ठ 179-80)

नरेन्द्र दक्षिणेश्वर से घर लौटा। फिर वही आजीविका की ंिचंता। एक एटर्नी के अािफस में कुछ काम करके और कुछ पुस्तकों के अनुवाद से थोड़ा पैसा मिलने लगा। लेकिन इतने बड़े परिवार के लिए यह काफी न था। सोच-सोचकर नरेन्द्र दक्षिणेश्वर पहुंचा और हठपूर्वक ठाकुर से कहा, ‘‘मां, भाइयों का कष्ट दूर करने के लिए आपको मां जगदम्बा से प्रार्थना करनी होगी।’’ रामकृष्ण ने सस्नेह उत्तर दिया ‘‘अरे, मैंने तो कितनी ही बार कहा है, ‘मां! नरेन्द्र का दुख-कष्ट दूर कर दो। तू मां


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पर ही संतुष्ट थे। किन्तु क्षण-भर बाद ही मैंने सात ऋषियों को समाधि लगाए बैठे देखा। मुझे ध्यान हुआ कि इन ऋषियों ने ज्ञान और पवित्रता में, त्याग और प्रेम में न केवल मानवों को वरन् देवों को भी पीछे छोड़ दिया होगा। मैं मुग्ध भाव से उनकी महत्ता का चिंतन कर ही रहा था कि उस अरूप प्रकाश-क्षेत्र के एक अंश ने घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु का रूप ग्रहण कर लिया। वह शिशु एक ऋषि के समीप आकर उनके गले से लिपटकर मधुर स्वर से पुकारता हुआ समाधि से जगाने का प्रयत्न करने


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