के एक मकान में आए। नरेन्द्र उनके दर्शन करने गया और वे उसे आग्रहपूर्वक अपने साथ दक्षिणेश्वर ले आए। दक्षिणेश्वर पहुंचकर मैं दूसरों के साथ कमरे में बैठा था। इतने में ठाकुर को भावावेश हुआ, देखते-देखते वे एकाएक मेरे पास आए और मुझे प्रेम से पकड़कर आंसु बहाते हुए गाने लगे:
कथा कहिते डराई,
ना कहिते ओ डराई,
(आमार) मने सन्देह हय
बुझि तोमाय हाराई, हा-राई।
(बात कहने में डरता हूं, न कहने में भी डरता हूं, मेरे मन में संदेह होता है कि शायद तुम्हें खो बैठूं।)
‘‘अन्तर की प्रबल भाव राशि को अब तक मैंने रोक रखा था। अब उसका
46 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वेग नहीं सम्भाल सका। ठाकुर की तरह मेरे भी नेत्रों से आंसुओं की धाराएं बह चली। हमारे इस प्रकार के आचरण से दूसरे लोग अवाक् रह गए। प्रकृतिस्थ होने पर उन्होंने हंसते हुए कहा,
‘‘एक दिन समाधि में मैंने पाया कि मेरा मन प्रकाश के पथ पर ऊंचाा उठ रहा है। तारा जगत् को पार करके वह शीघ्र ही विचारों की सूक्ष्मतर जाति में प्रविष्ट हुआ तथा और ऊंचाा उठने लगा। पथ के दोनों ओर मुझे देव-देवताओं के सूक्ष्म शरीर दीख पड़ने लगे। उस मंडल को भी पार करके मन वहां पहुंच गया, जहां प्रकाश की एक मर्यादा-रेखा सापेक्ष्य अस्तित्व को निरपेक्ष्य से पृथक कर रही थी। उस रेखा का भी उल्लंघन करके मन वहां पहुंच गया, जहां सरूप कुछ भी नहीं अपने-अपने आसन