हो गया कि ठाकुर ने उन बातों को सुनकर पहले कुछ नहीं कहा। बाद में भवनाथ ने रोते हुए जब उनसे कहा, ‘‘महराज, नरेन्द्र की ऐसी गति होगी, यह तो स्वप्न में भी संभव नहीं था।’ तो उस समय ठाकुर ने उत्ोजित होकर कहा था, ‘चुप रह मूर्ख! मां ने कहा है कि वह कभी वैसा नहीं हो सकता! यदि फिर कभी ऐसी बात मुझसे कही तो तेरा मुंह नहीं देख सकूंगा।’’ (रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृष्ठ 177)
नरेन्द्र को दूसरों की निंदा-प्रशंसा की कोई परवाह नहीं थी। गर्मी के बाद बरसात आई और चली गई, पर सब तरफ भटकते रहने के बावजुद रहने के बावजुद उसे कोई काम नहीं मिला। आखिर उसने सोचा कि साधारण मनुष्य की तरह धनोपार्जन के लिए उसका जन्म नहीं हुआ है। उसे अपने दादा की तरह संन्यास धारण करना होगा। जाने का दिन भी निश्चित हो गया। पर उसी दिन परमहंस पड़ोस
मुझसे वे यह क्या कह रहे है! उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर दोबारा कहा, ‘‘मुझे वचन दे कि तू मुझसे मिलने फिर अकेला आएगा और शीध्र।’’
नरेन्द्र ने इस अद्भुत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वचन तो दे दिया, पर मन में सोचा कि फिर यहां नहीं आऊंगा।
वे बैठक में लौट आए। वहां दूसरों की मौजुदगी में जो बातें हुई, उनमें पागलपन का लेशमात्र भी न थी।
रामकृष्ण ने नरेन्द्र के जन्म के बारे में अपने शिष्यों को भावावेश में एक अद्भुत कथा सुनाई थी। वह कथा रोमां रोलां ने अपनी पुस्तक -विवेकानन्द’ में यों बयान की हैः