की गुंजाइश नहीं। इतना ही कह देना काफी होगा कि बुर्जवा ने अपने वर्ग स्वभाव ही से कपिल के ‘अद्वैतवाद’ के साथ ‘आध्यात्मिक’ जोड़कर उसे ‘आध्यात्मिक अद्वैतवाद’ बनाया और अपने राजनीतिक शस्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया। इसे अलग फेंक देने के बजाए चाहिए यह कि ‘आध्यात्मिक’ शब्द हटाकर कपिल के अद्वैतवाद को ‘भौतिक’ शब्द जोड़कर मेहनतकश वर्ग के संघर्ष का शस्त्र ‘भौतिक अद्वैतवाद को बनाया जाए, जो द्वन्दात्मक भौतिकवाद ही का दूसरा नाम है। चूंकि यह अपने ही दार्शनिक विचार की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया है, इसलिए परम्परा से जुड़ी हुई जनता इसे सहज में ग्रहण कर लेगी और क्रांतिकारी भौतिक शक्ति में बदल सकेगी।

यही सब सोचकर मैंने ‘योद्धा सन्यासी विवेकानन्द’ पुस्तक लिखना शुरू की। अब सवाल यह है कि जब हमारे देश के अधिकांश माक्र्सवादी विवेकानन्द की अवहेलना करते हैं और हिंदू धर्म को घोर प्रतिक्रियावादी धर्म बताते हैं, मेरी यह समझ कैसे बनी?


11 of 675

है, वे हमें सभ्य बनाने के मिशन पर आए हैं, लूट-खसोट उनका उद्देश्य कदाचित नहीं है।

हमारे देश के उभरते हुए पूंजीपति वर्ग को इस विदेशी आक्रमण से अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करनी थी, क्योंकि राष्ट्रीयता का विकास उन्हीं के आधार पर सम्भव था और राजनीतिक लड़ाई भी उन्हीें के आधार पर लड़ी जा सकती थी।

इसी विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिक्रियास्वरूप उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ ही में पुनर्जागरण की चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके प्रथम प्रवक्ता राजा राममोहन राय और अंतिम विवेकानन्द


11 of 1117