फैली है, वह पूर्णतः सही न होने पर भी, उसमें से कुछ अंशों पर उनका विश्वास है, इस बात को वे इशारे से व्यक्त कर गए। मुझे वे लोग इतना हीन समझते हैं यह जानकर दंड पाने के भय से ईश्वर पर विश्वास करना दुर्बलता का लक्षण है। मै। ह्मूम बेन, मिल, काम्टे आदि पाश्चात्य दार्शनिकों के मतों को उद्वत करने लगा और ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है, यह दिखाने के लिए उनके साथ प्रचंड युक्ति तर्को की अवतारणा करने लग जाता था। यह जानकर कि वे लोग इस बात पर विश्वास करके चले गए कि मैं पतित हो गया हूं-मुझे प्रसन्नता ही हुई और सोचा कि ठाकुर भी उनके मुख से सुनकर इस पर विश्वास कर लेंगे। पर ऐसी ंिचंता मन में उठने से मैं फिर हताश हो गया। निश्चय किया-वे जो चाहे माने-मनुष्यों के मता-मतों को मूल्य ही जब तुच्छ है तो उससे मेरी क्या हानि है? परन्तु बाद में सुनकर मैं स्ताम्भित
बात करके मुझे शान्ति मिलेगी।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू बह निकले। नरेन्द्र हत्बुद्वि-सा उनकी ओर ताकता रहा।
देखते ही देखते रामकृष्ण परमहंस ने हाथ जोड़कर नरेन्द्र को सम्मान से सम्बोधित किया, ‘‘मैं जानता हूं, तू सप्तर्षि-मंडल है-नर रूपी नारायण है, जीवों के कल्याण की कामना से तूने देह धारण की है....’’
नरेन्द्र का कहना है कि उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर मैं एकदम अवाक् और स्तम्भित रह गया। सोचा, यह तो निरा पागलपन है। मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र,