और सिद्व करना शुरू किया। परिणाम यह हुआ कि नरेन्द्र की न सिर्फ नास्तिक के रूप में निंदा फैली बल्कि बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाने लगा कि दुष्ट लोगों की संगत में पड़कर वह शराबी और दुराचारी बन गया है। इस बेईमानी से नरेन्द्र और हठ पकड़ गया और वह लोगों के सामने सगर्व कहने लगा कि ‘अगर कोई अपना दुख-कष्ट कुछ समय तक भूल जाने के लिए शराब पीता है या वेश्या के पास जाता है, तो मैं इसमें कुछ भी दोष नहीं समझता। अगर वैसे ही उपायों से मैं भी अपना दुख भूल सकंू, जिस दिन यह बात मेरी समझ में आ जाएगी। मैं भी ऐसे काम करने से पीछे नहीं हटूंगा।
45 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उसकी ये बातें विविध प्रकार से विकृत होकर दक्षिणेश्वर में परमहंस के शिष्यों और कलकत्ता में उनके भक्तों तक पहुंची। लिखा है, ‘‘कोई-कोई मेरी स्थिति जानने के लिए मुझसे भेंट करने आए और जो निंदा
की तरह सहज भाव से मिले। नरेन्द्र को अपने करीब चटाई पर बैठा लिया और गाना सुनाने को कहा। नरेन्द्र ने ब्रह्मसमाज का ‘मन चलो निज निकेतन’ गीत गाया। फिर नरेन्द्र के अपने अनुसार जब गाना समाप्त हुआ तो वह उसे हाथ पकड़कर एकान्त में ले गए और भीतर से कमरा बंद करके
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बोले, ‘‘अरे तू इतने दिन कहां रहा? मैं कब से तेरी बाट जोह रहा हूं। विषयी लोगों के साथ बात करते-करते मेरा मुंह जल गया। आज तेरे समान सच्चे त्यागी के साथ