पर बैठा प्रार्थना कर रहा था, मां ने चिढ़कर कहा, ‘चुप रह छोकरे, बचपन ही से केवल भगवान-भगवान! भगवान ही ने तो यह सब किया है!’ मां की यह बात नरेन्द्र को कौंच गई। वह सोचने लगा-क्या भगवान सचमुच है? अगर है तो मैं जो इतनी प्रार्थनाएं करता हूं, वह सुनता क्यों नहीं? शिव के संसार में इतना अशिव क्यों है? उसे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के शब्द स्मरण हो आए-‘यदि भगवान दयामय और मंगलमय है तो अकाल में लाखों आदमी बिना अन्न क्यों मर जाते है?’
उसके मन में ईश्वर के विरूद्व प्रचंड विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई और वह सोचने लगा-ईश्वर यदि है भी तो उसे पुकारना व्यर्थ है, क्योंकि इससे कुछ लाभ नहीं होता।
अब नरेन्द्र ठहरा निडर और निर्भीक। मनोगत भावनाओं को छिपाए रखना उसके स्वभाव के विपरीत था। अपनी इस ईश्वर विरोधी भावना को उसने लोगों के सामने युक्ति द्वारा प्रमाणित
डाक्टर रामचन्द्र दत्त को सौंपा। जब यह प्रसंग छिड़ा तो नरेन्द्र ने साफ कह दिया कि मैं ब्याह के बंधन में नहीं पड़ूंगा, क्योंकि मैंने जीवन का जो उद्देश्य बना रखा है, ब्याह उसमें बाधक बनेगा। उत्तर सुनकर डाक्टर रामचन्द्र ने कहा, ‘‘यदि वास्तव में सत्य की प्राप्ति ही तुम्हारा उद्देश्य है तो ब्रह्मसमाज आदि में भटकना व्यर्थ है। तुम दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण देव के पास जाओ।’’
नरेन्द्र को सुरेन्द्रनाथ के मकान पर हुई भेंट याद आई और वह तीन-चार मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर पहुंचा।
रामकृष्ण चिरपरिचित