यह गान सुधारवर्षण कर सकता है। हां! एक समय था, जब मैं भी इसी प्रकार सोचा करता था! परंतु अब जब मैं जीवन की निष्ठुरताओं के सम्मुख खड़ा हुआ हूं, यह गाना मेरे कानों में एक भयानक उपहास के समान चोट करता है। ‘‘मेरे मित्र को इससे चोट पहुंची। उसे मेरी भयानक आपत्िा का कोई ज्ञान न था। अनेक बार जब मै। देखता था कि घर में खाने को पर्याप्त भोजन नहीं है, मैं अपनी मां से यह बहाना करके कि मुझे एक दोस्त ने निमंत्रित किया है, भूखा रह जाता था। मेरे धनी मित्र मुझे दुर्भाग्य के बारे में कौतुहल व चिंता प्रकट नहीं की। और मै। अपनी इस दुरवस्था को किसी पर प्रकट न करता था....(रामकृष्ण, पृष्ठ 262)
नरेन्द्र के चरित्र-गठन में मां का प्रभाव सबसे अधिक था। वे एक धर्मप्राण महिला थी। पर इस घोर संकट में उनका विश्वास भी डगमगा गया। एक दिन सुबह जब नरेन्द्र बिस्तर
एफ.ए की परीक्षा निकट थी, नरेन्द्र उसमें इतना व्यस्त रहा कि इस बात को भूल ही गया। परीक्षा समाप्त हुई तो पिता ने ब्याह की बात चलाई। नरेन्द्र का भावी ससुर दहेज में दस हजार रूपये नकद देने को तैयार था। पर नरेन्द्र इस झंझट में कैसे पड़ता? वह मित्रों से कहा करता था, ‘‘मैं विवाह नहीं करूंगा, और तुम लोग देखोगे कि मैं क्या बनता हूं।’’ विश्वनाथ बाबू बेटे पर किसी प्रकार का दबाव नही डालते थे। अब इस मामले में नरेन्द्र की राय जान लेने का काम उन्होंने अपने संबंधी