प्रथम सम्पर्क था। मैंने देखा कि इस जगह दुर्बल, गरीब और परित्यक्तों के लिए कोई स्थान नहीं है। वे व्यक्ति जो कुछ ही दिन पूर्व मेरी सहायता करने में गर्व अनुभव करते थे, उन्होंने सहायता करने की शक्ति के विद्यमान रहने पर भी अपने मुख फेर लिये। यह संसार मुझे शैतान की सृष्टि दिखाई देने लगा। एक दिन जलती दोपहरी में जब मैं मुश्किल से अपने पैरों पर खड़ा हो सकता था, मैं एक स्मारक की छाया में बैठ गया। वहां पर मेरे कई मित्र भी थे और उनमें से एक
44 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
मित्र भगवान की अपार करूणा का गान करने लगा। यह गान मुझे अपने सिर पर जान-बुझकर किया गया प्रहार जान पड़ा। अपनी माता और भाइयों की असहाय अवस्था याद कर मैं चिल्ला उठा, ‘यह गाना बंद करो? जो लोग अमीरों के घरों में पैदा हुए हैं और जिनके माता-पिता भूख से नहीं मर रहे हैं, उनके कानों में
सुरेन्द्रनाथ मित्र रामकृष्ण परमहंस के भक्त थे और वे शिमला मोहल्ला में ही रहते थे। नवम्बर 1881 के एक दिन उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपने मकान पर बुलाया और इस उपलक्ष में एक अनन्दोत्सव का आयोजन किया। कोई अच्छा गायक न मिलने के कारण उन्होंने अपने पड़ोसी नरेन्द्रनाथ को बुला लिया। रामकृष्ण परमहंस से यों नरेन्द्रनाथ का पहली बार साक्षात्कार हुआ। गाना सुना तो उन्होंने इस युवक की प्रतिभा को पहचान लिया। वह उठकर नरेन्द्र के पास आए, कुछ देर बातें की और फिर दक्षिणेश्वर आने का अनुरोध करके चले गए।