थे उससे कहीं अधिक खर्च करते थे। उनके मरते ही कर्ज़ख्वाहों ने आ घेरा। कर्ज चुकाना तो दूर रहा, छः-सात व्यक्तियों के लिए अन्न जुटाना समस्या बन गई। कहां रईसी ठाठ थे और कहां अब फाकों की नौबत आ गई। नरेन्द्र ने पहली बार दरिद्रता का स्वाद चखा। मित्र भी आजमाए गए, सबने इस संकट में मुंह फेर लिया। नरेन्द्र ही अब परिवार में सबसे बड़ा था, इसलिए आजीविका का भार उसी पर आ पड़ा। इसके लिए जो दोड़-धूप करनी पड़ी और उन दिनों उसकी जो मानसिक दशा थी उसका नरेन्द्र ने स्वयं विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उसका कुछ अंश रोमां रोलां ने इस प्रकार उद्वत किया हैः
‘‘मैं भूख से मरा जा रहा था। नंगे पैर मैं एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक दौड़ता, परन्तु सब तरफ से घृणा के अतिरिक्त और कुछ न मिलता। मैंने मनुष्य की सहानुभूति का अनुभव प्राप्त किया। जीवन की वास्तविकताओं के साथ यह मेरा
समय साधना-भजन में बिताता था। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार अपनी ‘विवेकानन्द-चरित’ पुस्तक में लिखते हैंः
‘‘इस प्रकार दिन पर दिन बीतते गये, पर सत्य को जानने की उनकी इच्छा तृप्त तो हुई नहीं, अपितु अधिकाधिक बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि अतींद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा-लाभ करना आवश्यक है, जिसने स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार किया है। उन्होंने अपने मन-प्राण से यह भी निश्चय कर लिया कि इसी जीवन में सत्य को प्राप्त करना होगा। नहीं तो इसी प्रयत्न में प्राण दे देने होंगे।’’ (पृष्ठ 83-84)