से महापुरूष का प्रशान्त मुखमंडल अपूर्व शान्ति और पुण्य की आभा से उद्भासित हो उठा। उन्होंने तनिक भी सोच-विचार न करते हुए, उत्तर दिया, ‘बेटा, मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं। तुम्हें जिस प्रकार प्रत्यक्ष देख रहा हूं, इससे भी कहीं अधिक स्पष्ट रूप से उन्हें देखा है।’ नरेन्द्र का विस्मय सौ गुना बढ़ाते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘क्या तुम भी देखना चाहते हो? यदि तुम मेरे कहे अनुसार काम करो, तो तुम्हें भी दिखा सकता हूं। ’’ (पृष्ठ 93-94)
इस वाणी में विश्वास का बल था। नरेन्द्र ने रामकृष्ण परमहंस को मन से गुरू धारण किया, अपनी साभिमान स्वतंत्रता उन्हें सौंप दी और उनके बताए अनुसार साधना आरम्भ की।
थोड़े ही दिन बाद उसके पिता हृदय रोग से अचानक चल बसे। नरेन्द्र के लिए यह भयंकर आघात था। सारे परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूटा। विश्वनाथ ने धन बहुत कमाया था, पर जितना कमाते
ध्यानानुराग में रंग गया। थोड़ा खाना, चटाई पर सोना, सफेद धोती और चद्दर पहनना और शारीरिक कठोरता का पालन करना उसका नियम बन गया।
उसने अपने घर के निकट नानी के मकान में एक कमरा किराये पर ले रखा
29 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
था। परिवार के लोग समझते थे कि घर पर पढ़ाई की असुविधा के कारण ही नरेन्द्र अलग रहने लगा है। विश्वनाथ बाबू ने बेटे की स्वाधीनता के कभी हस्तक्षेप नहीं किया था। इसलिए नरेन्द्र अध्ययन, संगीत आदि की चर्चा करने के बाद शेष