से क्या लाभ? रात-भर जागकर नरेन्द्र कितनी ही बातें सोचने लगे। एकाएक उन्हें दक्षिणेश्वर के उस अद्भुत प्रेमिक की बात स्मरण हो आई। सारी रात असहनीय उत्कंठा में बिताकर नरेन्द्र भोर होते ही दक्षिणेश्वर की ओर दौड़ पड़े। गुरूदेव के श्री चरण कमलों के पास पहंुचकर उन्होंने देखा, सदानन्दमय महापुरूष भक्तों में घिरे

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हुए अमृत मधुर उपदेश प्रदान कर रहे हैं।

‘‘नरेन्द्र के हृदय में मानो समुद्र मंथन आरम्भ हुआ। यदि वे भी ‘नहीं, कह दें, तो फिर क्या होगा? वे फिर किसके पास जाएंगे? अंततः प्रकति के साथ बहुत देर तक संग्राम करने के बाद अंत में जिस प्रश्न को वे अनेक धर्माचार्यों से पूछ चुके थे, पर आज तक कोई भी जिस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ न हुआ था, उसी प्रश्न को दोहराकर उन्होंने कहा ‘‘महाराज! क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?

‘‘मृदुहास्य


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के विषय में वह दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं था। उसे ब्रह्मसमाज में त्याग और धर्मनिष्ठा की कमी महसूस होती थी। नरेन्द्र जो कुछ देखता था, उसकी वह निर्भीक आलोचना करता था। उसका मन अब भी अशान्त था। और जिस जीते-जागते सत्य की उसे खोज थी, वह यहां भी दिखाई नहीं पड़ा। एक दिन देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे उपदेश देते हुए कहा ‘‘तुम्हारे अंग-प्रत्यंग में योगियों के चिहृ मौजूद हैं। ध्यान करने ही से तुम्हें शांति और सत्य की प्राप्ति होगी।’’

नरेन्द्र लगन का पक्का था। उसी दिन से


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