उन्मत की तरह ताकते हुए नरेन्द्रनाथ खड़े हैं। महर्षि को थोड़ी देर के लिए भी सोच-विचार या प्रश्न करने का अवसर न दे वे आवेगरूद्व कंठ से बोल उठे ‘महाशय, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?’ विस्मयचकित महर्षि ने न जाने क्या उत्तर देने के लिए दो बार चेष्टा की, परन्तु शब्द मुख ही में रह गए। अंत में बोले, ‘नरेन्द्र, तुम्हारी आंखें देखकर समझ रहा हूं कि तुम योगी हो।’ उन्होंने नरेन्द्र को कई तरह के आश्वासन देकर कहा कि वे यदि नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करें तो ब्रह्मज्ञान के अधिकारी बन सकेंगे, इत्यादि। नरेन्द्र प्रश्न का कोई ठीक उत्तर करें तो ब्रह्मज्ञान के अधिकारी बन सकेंगे, इत्यादि। नरेन्द्र प्रश्न का कोई ठीक उत्तर न पाकर घर लौट आए।

‘‘घर लौटकर नरेन्द्र ने दर्शन शास्त्र और धर्म-संबंधी पुस्तकों को दूर फेंक दिया। यदि वे ईश्वर प्राप्ति में उन्हें सहायता न दे सकीं तो व्यर्थ में उनके पाठ


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ब्रह्मसमाज राजा राममोहन राय के आदर्श और परम्परा से हट चुका था। केशव और उनके अनुयायी ईसाइयत में रंगे हुए थे और उनका चलन सनातन हिदू धर्म की उच्चतक मान्यताओं के प्रतिकूल था। लेकिन नरेन्द्र की बचपन ही से इन मान्यताओं में आस्था थी। संदेहवादी होते हुए भी उसमें दूसरे नौजवानों-सी उच्छृंखलता और अराजकता न थी।

नरेन्द्रनाथ ब्रह्मसमाज की रविवारीय उपासना में शामिल होता था और अपने मधुर कंठ से ब्रह्म संगीत सुनकर सदस्यों का मन प्रसन्न किया करता था। पर उपासना


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