ब्रह्मसमाज के अधिकांश नेताओं से नरेन्द्र का परिचय था। वह उनके पाण्डित्य से प्रभावित था, लेकिन उनमें से किसी के प्रति भी नरेन्द्र के मन में इतनी श्रद्वा नहीं थी, जितनी रामकृष्ण के प्रति। अब उन सबके चेहरे एक-एक करके उसकी आंखों के सामने घूमने लगे। उसने अपने आपसे पूछा कि इतने दिन ब्रह्मसमाज में उपासना-प्रार्थना करके भी उसका हृदय शान्त क्यों नहीं हुआ? क्या इनमें से किसी को भी ईश्वर-प्राप्ति हुई है?

सत्येन्द्रनाथ मजूमदार अपनी पुस्तक ‘विवेकानन्द-चरित’ में लिखते हैंः

‘‘एक दिन ईश्वर प्राप्ति के लिए तीव्र व्याकुलता लेकर नरेन्द्र घर से निकल पड़े। महर्षि देवेन्द्रनाथ उस समय गंगाजी पर एक नौका में रहा करते थे, नरेन्द्र गंगा किनारे पहुंचकर जल्दी से नौका पर चढ़ आए। उनके जा़ेर से धक्का देने पर दरवाज़ा खुल गया। महर्षि उस समय ध्यानमग्न थे, एकाएक शब्द सुनकर चैंक उठे। देखा, सामने


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ब्रह्मसमाज चंद साल पहले आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज में विभाजित हो गया था। पहले के नेता देवेन्द्रनाथ ठाकुर और दूसरे के केशवचन्द्र सेन थे। केशव बहुत बड़े वक्ता थे और उस समय उनकी ख्याति शिखर पर थी। बंगाली नौजवान उनसे बेहद प्रभावित थे। रोमां रोलां का कथन है कि नरेन्द्रनाथ उनसे ईष्र्या करते थे और स्वयं केशव बनने की महत्वकांक्षा रखते थे। लेकिन इसके बावजुद वह उनके अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज के सदस्य नहीं बने। कारण यह था कि अखिल भारतीय


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