रही थी 1905 में उसने स्वदेशी आंदोलन का राजनीतिक रूप धारण किया। इसमें राष्ट्रीय एकता का जो प्रदर्शन हुआ उसके कारण स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वराज का चारसूत्री कार्यक्रम निर्धारित हुआ।

इसके अलावा 1908 से क्रांति के जो गुप्त संगठन बने उनकी मुख्य प्रेरणा भी विवेकानन्द की शिक्षाएं थी। पुलिस ने जिन क्रांतिकारी नौजवानों के घरों की तलाशियां ली उनमें विवेकानन्द साहित्य ज़रूर मिला। इकबाल का कौमी तराना-‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ (1905 और) ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ इसी आध्यात्मिक विजय से प्रेरित होकर लिखे गए। सारांश यह कि विवेकानन्द को स्वामी या धार्मिक कहकर उनकी अवहेलना करना, छिलके के साथ गूदे को-अपनी राष्ट्रीय परम्परा को अलग फेंक देने की भूल करना है, और वह हमने की।

अब यहां अपने राष्ट्रीय बुर्जवा और उनके सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता विवेकानन्द के अंतर्विरोधों पर बहस करने


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में पूंजीवादी वर्ग अस्तित्व में आया था और वह स्वभावतः विस्तार चाहता था। पर उसके विस्तार का मार्ग विदेशी

साम्राज्यवादी शासकों ने अवरूद्व कर रखा था। अंग्रेज शासक सैन्य बल में बढे़-चढे़ थे, उनकी औद्योगिक सभ्यता निश्चित रूप से हमारी सामंती सभ्यता से श्रेष्ठ थी। अर्थतंत्र और व्यापार पर उनका अधिकार था। इसके अलावा उन्होंने हमारे आत्मविश्वास को तोड़ने अर्थात् हमारी राष्ट्रीय भावना को नष्ट करने के लिए सांस्कृतिक आक्रमण भी शुरू कर दिया। इस क्षेत्र में उनका नारा था कि हम मूर्ति-पूजक तथा जंगली


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